क्या भारत में आज लोकतंत्र है ?

मेरी दृश्टि में तो आज लोकतंत्र के नाम पर तानाशाही से भी गया बीता माहोल है।
लोकतंत्र का तात्पर्य होता है जहां लोग यानि जनता राष्ट को चलाए न कि एक परिवार। लेकिन आंखें खोलकर देखों कि क्या जनता का शासन है या किन्हीं 10-20 परिवारों का। देश को आजाद हुए 76 वर्ष हो गए हमेशा से ही सत्ता घूम फिर कर कुछ चुन्निदा परिवारों के ही हाथों में रही। और आज का माहोल तो देखों कि वर्तमान सरकारों के विरुद्ध कोई कुछ भी बोल नही सकता कोई बोले तो उसके लिए एक ही मंजिल है और वो है जेल ! और तो और आज का मीडिया भी सरकार के विरुद्ध कुछ नही बोलता केवल सरकार की चापलूसी में ही वयस्त रहता है क्योंकि अगर सरकार के विरुद्ध बोला तो चैनल बंद होने की नौबत आ जाती है। तो तुम क्या कहते हो ऐसी ही व्यवस्था को तुम लोकतंत्र कहते हो।
मेरी दृश्टि में तो हम मौहल्लें में सामाजिक कार्यो के लिए समीतियां होनी चाहिए वो सभी मिल कर उसी मौहल्लें के किसी रिटायर जज, प्रींसिपल, डा0, इंजीनियर, टीचर आदि को चुने जो कि पूर्ण रुप से निर्दलिय हो और ऐसे ही पूरे भारत से 542 निर्दलिय व्यक्ति चुन कर लोकसभा पहुंचें और किसी ईमानदार रिटायर चीफ जस्टीस या किसी पढे-लिखे व्यक्ति को चुनकर प्रधानमंत्री के लिए आमंत्रित किया जाए और यह व्यवस्था हर व्यक्ति के लिए केवल 5 वर्श के लिए यानि केवल एक बार ही देश की सेवा करने के लिए चुना जाने की हो। तो बार-बार जब नए रिटायर लोग चुन-चुन कर देश को चलाने में आगे आऐंगें तब हम कह पाऐंगें कि अब लोकतंत्र है।
और आज की बात करे तो आज तानाशाही के अलावा कुछ भी नही है। बाजार जाकर हिटलर की कुछ पुस्तकें खरीद कर ले आओं उन्हें पढ़ों और फिर तुलना कर लेना कि हिटलर की तानाशाही में और आज के समय मे क्या-क्या सामानताऐं है और क्या-क्या विशमताऐं है।
मेरे से ज्यादा समझदार तुम हो जो अच्छा लगे उसे ही सही मानना।

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